नजाने क्यूँ अब मैं रुक सी गई हूँ
कोई तो होता जो सुनता मुझे
उधड़ जाती गर तो बुनता मुझे
मेरा दीपक वो बन जाता ओर फिर
अँधेरा मेरा होता तो रंगता मुझे
आज हूँ मैं बस, पर मैं बेबस नहीं हूँ
उठूंगी एक दिन मैं फिरसे चलूंगी
रात गर मेरी काली तो भी है गम क्या
सूरज अपना मैं खुद ही चुनूँगी
बढ जाउंगी मैं बन के यूँ नदिया की
मेरी अँखियों का पानी में खुद ही पियउँगीi
फिर मिलूँगी मैं खुद से यूँ बनके समुन्दर
आकाश का न मेरे होगा कोई मंज़र
पर फिर भी, नाजाने मैं क्यूँ आज ये सोचती हूँ
नजाने मैं क्यूँ अब रुक सी गई हूँ
नजाने मैं क्यूँ अब रुक सी गई हूँ
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