Monday, 30 September 2019

नजाने क्यूँ अब मैं रुक सी गई हूँ

नजाने क्यूँ अब मैं रुक सी गई हूँ

कोई तो होता जो सुनता मुझे
उधड़ जाती गर तो बुनता मुझे
मेरा दीपक वो बन जाता ओर फिर
अँधेरा मेरा होता तो रंगता मुझे

आज हूँ मैं बस, पर मैं  बेबस नहीं हूँ
उठूंगी एक दिन मैं फिरसे चलूंगी
रात गर मेरी काली तो भी है गम क्या
सूरज अपना मैं खुद ही चुनूँगी

बढ जाउंगी मैं बन के यूँ नदिया की
मेरी अँखियों का पानी में खुद ही पियउँगीi
फिर मिलूँगी मैं खुद से यूँ बनके समुन्दर
आकाश का न मेरे होगा कोई मंज़र
 पर फिर भी, नाजाने मैं क्यूँ आज ये सोचती हूँ 

 नजाने मैं क्यूँ अब रुक सी गई हूँ
नजाने मैं क्यूँ अब रुक सी गई हूँ

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