Monday, 30 September 2019

बेटी हूँ ज़िम्मेदारी नहीं मैं


बेटी हूँ ज़िम्मेदारी नहीं मैं
लड़की हूँ पर बेचारी नहीं मैं
बहू बनी पर क्यु अपनी नहीं मैं
पत्नी बनी पर साथी नहीं मैं
बेटी हूँ ज़िम्मेदारी नहीं मैं
सुन मेरी बिटिया
माँ हूँ तेरी मैं
और हूँ दोस्त भी
यही रिश्ता लगे बस अपना मेरा
तू बेटी मेरी है ज़िम्मेदारी नहीं तू
सुन मेरी बिटिया तू गहना मेरा
जब तू बड़ी हो तो कहना जरा
माँ मैं पूरा करने चली अब सपना तेरा
बदलूंगी दुनिया है क्योंकि कोई अब अपना मेरा
और हैं माँ बेटी हूँ तेरी मैं तेरा गर्व हूँ
बेटी हूँ ज़िम्मेदारी नहीं मैं
बेटी हूँ ज़िम्मेदारी नहीं मैं





नजाने क्यूँ अब मैं रुक सी गई हूँ

नजाने क्यूँ अब मैं रुक सी गई हूँ

कोई तो होता जो सुनता मुझे
उधड़ जाती गर तो बुनता मुझे
मेरा दीपक वो बन जाता ओर फिर
अँधेरा मेरा होता तो रंगता मुझे

आज हूँ मैं बस, पर मैं  बेबस नहीं हूँ
उठूंगी एक दिन मैं फिरसे चलूंगी
रात गर मेरी काली तो भी है गम क्या
सूरज अपना मैं खुद ही चुनूँगी

बढ जाउंगी मैं बन के यूँ नदिया की
मेरी अँखियों का पानी में खुद ही पियउँगीi
फिर मिलूँगी मैं खुद से यूँ बनके समुन्दर
आकाश का न मेरे होगा कोई मंज़र
 पर फिर भी, नाजाने मैं क्यूँ आज ये सोचती हूँ 

 नजाने मैं क्यूँ अब रुक सी गई हूँ
नजाने मैं क्यूँ अब रुक सी गई हूँ